सरकती सुलगती .. संकीर्ण राहों पर
कभी न देखा वो, उफनता समंदर
जहाँ चाह वहां राह, फिर भी अत्यंत गुमराह
सरल सटीक राहों में , फिर क्यों ये हाहाकार..
अनदेखी अनजानी , अनवरत बेगानी
शौम्य सहज राहों में, फिर क्यों हम बेजार.
कुदरत का है कुटिल किन्तु भ्रामक प्रहार
सहजते संभलते पर ..फिर भी हैं लाचार..
कुंचित बिलम्ब न हो जाए, समझते संभलते
कि जब सुलझे पहेली, कहीं वो न हो आखिरी बार.

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