Wednesday, May 04, 2011

अपनी जमीं ..अपनी मोहब्बत

हर शाख पे  अब भी वही , मैना  चहकती  होगी ..
हर तपती दोपहरी मैं ..अब भी वही रेत उडती  होगी.
तू शायद अब भी , चिलमन से यूँ ही निहारती होगी
तेरी हिमाकत तुझे आज भी , हरदम फटकारती होगी.
तू अब   भी, उसी वक़्त .. दोहपर में रोज   आती होगी..
शुर्ख  लाली  अब भी तेरे चहरे  पर  नजर आती होगी.
एक दशक  से ज्यादा  गुजर गया  जैसे  चंद लम्हों में  
सब कुछ बदल  गया , सिर्फ अनकही यादों के ..सिवा . 
हमें यकीन  है सब कुछ वही होगा , सिर्फ तेरे सिवा 
मैना भी  होगी , दोपहरी भी वही,    सिर्फ मेरे  सिवा.
तू बदल गयी होगी , पर  जमीं एक दम  वही होगी
सूरतें चाहें बदल गयीं हो, पर मोहबतें वही होंगी.
नजारें चाहे बदल गए होंगे , पर हरकतें वही होंगी.
दायरे चाहे संकरे हो   गए हों, पर संजीदगी  वही होंगी.

No comments:

Post a Comment

Popular Posts