कभी न थिरका , उन लब्जों का स्पन्दन ..
फिर भी तुमने न किया कभी जिक्रे मन मंथन ..
वो बीते हुए पल और भूली हुई आखिरी वो मंजिल
कभी भी न दर्शायी ..वो दिल की आधी अधूरी चुभन..
दहलते दिलों का था वो, सरकता , बिखरता आलम
फिर भी न किया इजहार, हमने वो तहरीरे अपनापन
नहीं कभी हुआ अहसास की तुम में भी वही लगन
क्यों की तुमने न कभी किया उन लब्जों का अन्तमन ..
हम भी थे अस्थिर, अधैर्य और सचमुच अचेतन
लब्जों के बिना न समझ पाए तुम्हारा अपनापन.
प्यार में जरूरी है इन तीन लब्जों का होना बयां

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