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मैं जूझता हूँ समय से, पर कमवक़्त मिलता ही नहीं ..
जो मिलता है दिलो जान से, उससे मैं जूझता ही नहीं .
मेरी तमन्नाएं और लगन, कहीं मृगतृष्णा तो नहीं
तो फिर जहाँ लगन है, वहां एक सहज राह क्यों नहीं.
जिन धाराओं में मैं बहता हूँ एकदम सहज और निर्वाह
तो फिर उन धाराओं का मैं, अकेला मकसद क्यों नहीं.
मैं चल रहा हूँ , जिन राहों पर आज भी बेपनाह, अनन्तर
तो फिर उन राहों में मुझे, वो सकून और चैन क्यों नहीं.
रंज है मुझको मेरी इस, अकस्मात् सोच और समझ पर
कम से कम एक अंतरद्वंध तो है मेरे मानस पटल पर.
कम से कम एक अंतरद्वंध तो है मेरे मानस पटल पर.
काश! समय और नियति का फिर से एक वही दौर आये
हर भूले को, उसकी मंजिल पाने का नजरिया मिल जाये.


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