Thursday, May 05, 2011

प्यार की हद ..कुछ और ...


क्या मोहब्बत को कोई बाँध सकता है..
रिश्तों में या फिर उम्र भर की कसमों में
क्या प्यार की रफ़्तार रहती है.. हमेशा एक
या दिन ब दिन..बदलती है  रूख हवा जैसी 
अगर ऐसा न होता तो..कोई बेवफा न होता..
.दर्दे दिल न होता ..दुख का समंदर न होता.
बेवफाओं  के बेंइन्तहाँ अफ़साने न होते 
कोई कभी अकेला न होता, बेदर्दी न होता.
प्यार अगर पावन  है..तो सोचो जरा गौर से 
हजारों कसमें खाने वाले कैसे हो जातें हैं किसी और के.
सब कुछ  भूलकर  चंद बातो  पे  हुआ हमें यकीं 

सच्चा  प्यार कुछ लम्हों का ही   बहुत   है..
लम्हों को याद रख ..तस्वीर को भूल जा.
इंसानियत को याद रख , इंसान को भूल जा.

1 comment:

  1. उत्कृष्ट.
    आप गालिब गढ़वाली हैं

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