आफताब - sun
इस निराले शहर में, इन हवाओं का भी ऐतबार नहीं
जिन हवाओं मे रफ़्तार ही नहीं, वो कैसे तूफ़ान हो जायेगा.
तेरी बौखलाहट में, तेरे दर का पता मिलता ही नहीं
तू मिलने को बेकरार ही नहीं, तो कैसे सकूंन मिल जाएगा.
दिल में नफरत घोलकर , तू खोजता है राहेदिल कहीं
जो मोहब्बत का न हो सका , फिर तू उसका कैसे हो जायेगा.
दिन दुपहरी , रात बीती और शामें कभी गुजरी नहीं
जो कभी जीता नहीं हो , वो कैसे सिकंदर हो जायेगा.
जिन अंधेरों में तू, मुझको छोड़ के लौटा ही नहीं
जो अन्धेरें में जिया हो, वो कैसे आफताब हो जायेगा.
मेरे सीने में आज भी वही, सैलाब उफन के रूकता नहीं
जो दरिया कभी रूका ही नहीं, वो कैसे समंदर हो जायेगा.
तेरे जाने के बाद भी , मैं कभी ज़रा भी सिसका नहीं
जो खुद से ही न लड़ा हो , वो कैसे इन्कलाब हो जायेगा.

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