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The fundamental factor of self-deception is this constant desire to be something in this world and in the world hereafter. So we begin to deceive ourselves the moment there is this urge to be, to become or to achieve.
Truth is not something to be gained. Love cannot come to those who have a desire to hold on to it, or who like to become identified with it. Surely such things come when the mind does not seek, when the mind is completely quiet, no longer creating movements and beliefs upon which it can depend, or from which it derives a certain strength, which is an indication of self-deception. It is only when the mind understands this whole process of desire that it can be still. Only then is the mind not in movement to be or not to be; then only is there the possibility of a state in which there is no deception of any kind.
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बदगुमानी - suspiciousness
अश्क - Tears
तर्क - Arguments
भ्रमित - confuse
दौर-ए-आसमानी - flying high
किये बेंइन्तहां तर्क , हमने उनसे और जमाने से
हम आज भी हैं भ्रमित, उनकी इस कहानी से.
हुआ है आहत तन बदन, उनकी तनहाई से
दिले ज़ख़्म फिर हरे हो गए हैं अश्क के पानी से.
ढलके हैं अश्क मेरे , शब्-ए-गम भरी रवानी से
दर्द के चिराग हम ने जलाये, अश्क के पानी से.
न काम आई मेरी जुर्रते लब-ए-इज़हार
वो बदगुमान ही हुआ मेरी खुशबयानी से.
मैं चाहता हूँ तुम्हारा भरम रहे बरकरार
निकाल दो मेरे साये को इस कहानी से.
मुझे भी जुल्म और दरिंदगी का अगया है हुनर
मिला कमाल ये तुम्हारी ही मेहेरबानी से.
किसी से कुछ न कहा और कह दिया सब कुछ
जुबान का काम लिया मैंने बेजुबानी से.
अभी इस ज़मी से नहीं मेरा वास्ता उस कदर
गुज़र रहा हूँ अभी दौर-ए-आसमानी से .
मिला कमाल ये तुम्हारी ही मेहेरबानी से.
किसी से कुछ न कहा और कह दिया सब कुछ
जुबान का काम लिया मैंने बेजुबानी से.
अभी इस ज़मी से नहीं मेरा वास्ता उस कदर
गुज़र रहा हूँ अभी दौर-ए-आसमानी से .

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